धन से असली सुख

एक बार एक गांव में एक बड़े साहूकार का एक सुन्दर बेटा था। उसके पास समृद्धि और धन-दौलत की कमी नहीं थी, लेकिन उसमें अहंकार और दूसरों को ताक़त से देखने की आदत थी। उसे अपने आप में एक शक्तिशाली और महान व्यक्ति मानने की चाह थी। एक दिन, उसके गांव में एक पुराने साधु बाबा का आगमन हुआ। उस साधु बाबा की दृष्टि अजीब तरीके से उस बड़े साहूकार को प्रभावित कर गई। बाबा ने अपने आंखों में स्नेह भरी हसी है और बोले, "बेटा, तुम तो धनवान हो, लेकिन क्या तुम सच्चे सुखी हो? धन के बिना असली सुख कहाँ मिलता है।" बड़े साहूकार ने अपनी आदतों में कुछ नहीं बदला, लेकिन उस साधु बाबा के साथ उसकी बातचीत में समय बिताना शुरू किया। बाबा के संदेशों का असर होने लगा और धीरे-धीरे उसका अहंकार टूटने लगा। वह समझ गया कि असली सुख समझदारी, समर्पण, और दूसरों की मदद करने में है। वह धन का उपयोग भी समझदारी से करने लगा और गांव के लोगों के लिए विभिन्न समाज सेवा परियोजनाओं में निवेश करने लगा। इस तरह, बड़े साहूकार ने न केवल अपने आप को सच्चे सुखी बनाया, बल्कि उसने अपने गांव को भी समृद्ध, समाजवादी और सहानुभूति से भर दिया। सच्चे सुख की प्राप्ति में साधु बाबा का बड़ा हाथ था, जिसके लिए वह हमेशा उन्हें ऋणी महसूस करता रहा।

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